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अजय कुमार, लखनऊ  

    बिहार में भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मंसूबों पर पानी फेरने के बाद अपने आप को केन्द्रीय राजनीति में फिट करने को आतुर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपने लिये बिहार और सीएम का पद छोटा लगने लगा है। भले ही नीतीश न-न कर रहे हों लेकिन हकीकत यही है कि वह बिहार से निकल पर पूरे देश में और मुख्यमंत्री से आगे प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं। इसके लिये उन्हें यूपी जीतना जरूरी है। यूपी में 2019 के लोकसभा से पहले  2017 में विधान सभा चुनाव होने हैं। नीतीश उत्तर प्रदेश जीतना तो चाहते हैं, परंतु यहां उन्हें न तो समाजवादी पार्टी घास डाल रही है और न ही बसपा की बहनजी। ऐसे में नीतीश के सामने सिर्फ कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल जैसी पार्टियों का ही विकल्प बचता है।

कांग्रेस की यूपी में क्या हाल है, किसी से छिपा नहीं है। सिमटते-सिमटते कांग्रेस यहां लोकसभा की दो और विधान सभा में 28 सीटों पर पहुंच गई है। 2012 के विधान सभा चुनाव हो या फिर 2014 के लोकसभा चुनाव कांग्रेस के अधिकांश प्रत्याशी चौथे नंबर पर ही रहे। लोकसभा चुनाव में तो कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को भी जीत के लिये एड़ियां रगड़ना पड़ गई थीं। इतना सब होने के बाद भी यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि कांग्रेस 2019 में नीतीश कुमार की सरपरस्ती में चुनाव लड़ना पसंद करेगी। वह (कांग्रेस) तो स्वयं अपने युवराज को पीएम बनाने का सपना देख रही है। हॉ, 2017 के विधान सभा चुनाव के लिये जरूर जदयू-कांग्रेस के बीच समझौता हो सकता है।

     गैर कांग्रेसवाद की विचारधारा के पोेषक डा0 लोहिया को अपना गुरू बताने वाले नीतीश कुमार यूपी में कांग्रेस के सहारे संघ मुक्त भारत का सपना देख रहे हैं तो इससे यही संकेत निकलता है कि नीतीश न तो भाजपा -संध और मोदी के खिलाफ हैं न कांग्रेस और राहुल गांधी के खिलाफ। वह तो हर उस दल और नेता का विरोध करते है जो उनके पीएम बनने के रास्ते में रोड़ा नजर आता है। पहले नीतीश कुमार कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर पीएम बनने का सपना देखते थे, यह हो न सका।  अब वह 2019 में  मोदी को पटकनी देना चाहते हैं। यहां तक तो बात समझ में आती है, लेकिन जब वह बात संघ मुक्त भारत की करते हैं तो उनकी नियत में खोट दिखाई देने लगता है। संघ न तो सत्ता में है न ही चुनावी राजनीति का हिस्सा। ऐसे में संघ को कैसे खत्म किया जा सकता है। या तो नीतीश यह कहें कि हम सत्ता में आयेंगे तो संघ पर प्रतिबंद्व लगा देंगे, लेकिन वह ऐसा भी नहीं कह रहे हैं। दस साल तक संघ के बगलगीर रहने वाली भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर सरकार चलाने वाले नीतीश कुमार का चाल-चरित्र और चेहरा किसी के भी समझ में नहीं आ रहा है। बीस वर्षो तक लालू प्रसाद यादव को गाली देने वाले नीतीश कुमार जब कुर्सी के लिये लालू की शरण में जाते हैं तो आश्चर्य होता है। बिहार में उसी कांग्रेस के साथ सीटों का बंटवारा करते हैं जिसके खिलाफ वह सत्ता में आये थे तो नीतीश की नियत में खोट साफ नजर आती है। 

    बिहार में लालू की बैसाखी के सहारे सत्ता सुख भोगने वाले नीतीश  कुमार का जदयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद पूरा फोकस उत्तर प्रदेश पर आ गया है। उनके द्वारा यूपी और दूसरे राज्यों में पार्टी के विस्तार का रोडमैप तैयार किया है। इसकी शुरुआत 12 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से होगी। नीतीश 12 मई को पिंडरा में कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित करेंगे और 13 मई को गंगा आरती में भी शामिल होंगे। जदयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद नीतीश का बिहार से बाहर जदयू का विस्तार पहला लक्ष्य है। यूं तो पश्चिम बंगाल, असम और केरल में भी जदयू कुछ सीटों पर चुनाव लड़ रहा है, लेकिन असली परीक्षा में यूपी है। हिन्दी शासित प्रदेश और बिहार का पड़ोसी राज्य होने के नाते भी उन्हें यूपी में राजनीतिक संभावना ज्यादा दिख रही है। वाराणसी के बाद नीतीश का अगला पड़ाव लखनऊ होगा। 15 मई को वे लखनऊ स्थित रविन्द्रालय में पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह द्वारा स्थापित किसान मंच के सम्मेलन में शामिल होंगे। सम्मेलन में उन्हें शराबबंदी के ऐतिहासिक फैसले के लिए महिला किसानों की ओर से सम्मानित भी किया जाएगा। नीतीश बिहार में शराबबंदी लागू करने के फैसले को पूरे देश में अपनी ताकत बनाना चाहते हैं।

    बहरहाल, सवाल यही उठता है कि यूपी में सबसे ताकतवर दो दलों सपा-बसपा के बिना नीतीश कुमार कैसे भाजपा को यूपी में नेस्तानाबूत करने का सपना देख रहे हैं ? कांग्रेस के अलावा नीतीश कुमार जिन दलों पर निगाह जमाये हुए हैं उसमें कुछ क्षेत्रीय क्षत्रपों के अलावा राष्ट्रीय लोकदल, पीस पार्टी, उलेमा कांउसिंल, राष्ट्रीय कं्रातिकारी समाजवाद पार्टी, स्वराष्ट्र जन पार्टी, अंबेडकर दल, भारतीय किसान परिवर्तन पार्टी,कौमी एकता दल, परदेश निर्माण पार्टी,आज विकास पार्टी और वतन पार्टी जैसे दल हैं। इन दलों कंे सहारे नीतीश उत्तर प्रदेश में क्या गुल खिला पायेंगे। यह देखने वाली बात होगी। बात भारतीय जनता पार्टी की कि जाये तो वह नीतीश के यूपी आगमन से तब तक चिंतित नहीं होगी, जब तक कि उसे बसपा या सपा में से किसी एक दल का साथ नहीं मिलता है। इन दलों के बिना यूपी में महागठबंधन की कल्पना साकार नहीं हो सकती है। यूपी मंे जनता दल युनाइटेड की ताकत की कि जाये तो यूपी में जदयू हमेशा ठीक वैसे ही हासिये पर रहा है जैसे बिहार में सपा-बसपा रहते हैं। बिहार में महागठबंधन ने सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के साथ जिस तरह का व्यवहार किया था,वह यूपी की जनता भूली नहीं है।लालू-नीतीश द्वारा कांग्रेस का साथ लेने की वजह से ही मुलायम ने महागठबंधन से किनारा कर लिया था और आज भी डा लोहिया का यह शिष्ट(मुलायम सिंह यादव) संघ मुक्त नही, कांग्रेस मुक्त भारत की बात करते हैं।

    लब्बोलुआब यह है कि नीतीश कुमार अगर उत्तर प्रदेश में दस्तक देते हैं तो वह अप्रत्यक्ष तौर पर भाजपा को फायदा पहुंचायेंगे और सपा-बसपा के लिये वोट नोचुआ बन सकते हैं। देखना यह भी होगा कि 2019 से पहले  कौन-कौन से दल और नेता नीतीश की पीएम पद की दावेदारी को स्वीकार करेंगे। सपा नेता और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तो मुलायम को पीएम पद का उम्मीदवार बना ही दिया हैं। मायावती भी नीतीश कुमार के साथ जाने वाली नहीं हैं। वह स्वयं ही राहुल गांधी की तरह पीएम बनना चाहती हैं।ऐसे में यह कहा जा सकता है कि यूपी में नीतीश कुमार का राजनैतिक सफर आसान नहीं होगा।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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