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मूर्तियों का प्राचीनतम उपयोग .... मूर्ति पर अगर कोई बहुत देर तक चित्त एकाग्र करे और फिर आंख बंद कर ले तो मूर्ति का निगेटिव आंख में रह जाएगा, जैसा कि कैमरे की फिल्म पर रह जाता है। और उस निगेटिव पर भी ध्यान अगर केंद्रित किया जाए तो उसके बड़े गहरे परिणाम हैं।

तो महावीर की मूर्ति या बुद्ध की मूर्ति का जो पहला प्रयोग है, वह उन लोगों ने किया है, जो अशरीरी आत्माओं से संबंध स्थापित करना चाहते हैं। तो महावीर की मूर्ति पर अगर ध्यान एकाग्र किया और फिर आंख बंद कर ली और निरंतर के अभ्यास से निगेटिव स्पष्ट बनने लगा तो वह जो निगेटिव है, महावीर की अशरीरी आत्मा से संबंधित होने का मार्ग बन जाता है। और उस द्वार से अशरीरी आत्माएं भी संपर्क स्थापित कर सकती हैं। यह अनंत काल तक हो सकता है।

तो मूर्ति पूजा के लिए नहीं है, एक डिवाइस है, जिसके माध्यम से जिनके शरीर खो गए हैं और जो शरीर ग्रहण नहीं कर सकते हैं, उनमें एक खिड़की खोली जा सकती है, उनसे संबंध स्थापित किया जा सकता है। अशरीरी आत्माएं भी संबंध खोजने की कोशिश करती हैं। और आज भी जगत में ऐसी चेतनाएं हैं, जो इन मार्गों का उपयोग कर रही हैं। थियोसाफी का सारा का सारा जो विकास हुआ, वह अशरीरी आत्माओं के द्वारा भेजे गए संदेशों पर निर्भर है।

~ ओशो ~ (महावीर मेरी दृष्टि में, प्रवचन #4)

जिसे तुम प्रार्थना समझते हो, वो अज्ञान है.... मैं बहुत चमत्कृत हो जाता हूं यह देखकर कि लोग जाकर मंदिरों में झुक जाते है, जो आकाश को तारों से भरा देखकर नहीं झुकते। इनका मंदिर में झुकना झूठा होगा, निश्चित झूठा होगा। इसमें हार्दिकता नहीं हो सकती। आदमी की बनाई हुई मूर्ति में इन्हें क्या दिखाई पड़ सकता है ? आदतवश झुक जाते होंगे। बचपन से झुकाए गए होंगे इसलिए झुक जाते होंगे मां – बाप ने कहा होगा, झुको, इसलिए झुक जाते होंगे, भय के कारण झुक जाते होंगे — कि कहीं नरक न हो, कहीं दंड न मिले। या लोभ के कारण झुक जाते होंगे कि झुकने से स्वर्ग मिलेगा, पुरस्कार मिलेंगे।

लोग अपने भय, कमजोरी, नपुंसकता के कारण झुक जाते हैं और समझ लेते हैं कि हम खुदा के सामने झुक रहे हैं। अज्ञान है; तुमने प्रार्थना समझी है उसे ? वहां प्रार्थना बिल्कुल नहीं है, प्रेम बिल्कुल नहीं है। सरासर झूठ है। क्यों? क्योंकि अगर आंखों में प्रेम होता तो इन पास खड़े वृक्षों के पास तुम्हारे झुकने का मन न होता ? कोयल कूकती और तुम न झुकते ? मोर नाचता और तुम न झुकते ? आकाश बादलों से भर जाता और तुम न झुकते ? चांदनी के फूल झर – झर झरते और तुम न झुकते ? कोई हंसता और तुम न झुकते ? मिट्टी में और हंसी ? किस चमत्कार की प्रतीक्षा कर रहे हो ? उसके चरण – कमल प्रत्येक पल हैं, प्रत्येक स्थल पर हैं। एक – एक रेत के दाने पर उसके हस्ताक्षर हैं, लेकिन संवेदनशीलता चाहिए।

~ ओशो ~ (नाम सुमिर मन बावरे, प्रवचन #9)

प्रेम, करुणा, साक्षी, उत्सव–लीला ....  क्राइस्ट ने जिसे प्रेम कहा है वह बुद्ध की ही करुणा है, थोड़े से भेद के साथ। वह बुद्ध की करुणा का ही पहला चरण है। क्राइस्ट का प्रेम ऐसा है जिसका तीर दूसरे की तरफ है। कोई दीन है, कोई दरिद्र है, कोई अंधा है, कोई भूखा है, कोई प्यासा है, तो क्राइस्ट का प्रेम बन जाता है सेवा। दूसरे की सेवा से परमात्मा तक जाने का मार्ग है; क्योंकि दूसरे में जो पीड़ित हो रहा है वह प्रभु है। लेकिन ध्यान दूसरे पर है। इसलिए ईसाइयत सेवा का मार्ग बन गई।

बुद्ध की करुणा एक सीढ़ी और ऊपर है। इसमें दूसरे पर ध्यान नहीं है। बुद्ध की करुणा में सेवा नहीं है; करुणा की भाव – दशा है। यह दूसरे की तरफ तीर नहीं है, यह अपनी तरफ तीर है। कोई न भी हो, एकांत में भी बुद्ध बैठे हैं, तो भी करुणा है।

बुद्ध की करुणा तो बड़ी अभौतिक है, और जीसस की करुणा बड़ी भौतिक है। इसलिए ईसाई मिशनरी अस्पताल बनायेगा, स्कूल खोलेगा, दवा बांटेगा। बौद्ध भिक्षु कुछ और बांटता है; वह दिखाई नहीं पड़ता। वह जरा सूक्ष्म है। वह ध्यान बांटेगा, समाधि की खबर लायेगा। वह भी स्वास्थ्य के विचार को तुम तक लाता है, लेकिन आंतरिक स्वास्थ्य के, असली स्वास्थ्य के।

अष्टावक्र का साक्षी और एक कदम आगे है। अब कहीं कुछ आता – जाता नहीं, सब ठहर गया है, सब शांत हो गया है। अष्टावक्र कहते हैं आत्मा न जाती है न आती है, अब गंध अपने में ही रम गई है। साक्षी – भाव जाता ही नहीं, ठहर गया, सब शून्य हो गया। क्राइस्ट के प्रेम में दूसरा महत्वपूर्ण है; बुद्ध की करुणा में स्वयं का होना महत्वपूर्ण है, साक्षी में न दूसरा रहा न स्वयं रहा, मैं – तू दोनों गिर गये।

और उत्सव–लीला.... वह आखिरी बात है। साक्षी में सब ठहर गया, लेकिन अगर यह ठहरा रहना ही आखिरी अवस्था हो तो परमात्मा सृजन क्यों करे? परमात्मा तो ठहरा ही था! तो यह लीला का विस्तार क्यों हो? तो यह नृत्य, यह पक्षियों की किलकिलाहट, ये वृक्षों पर खिलते फूल, ये चांद–तारे! परमात्मा तो साक्षी ही है! तो जो साक्षी पर रुक जाता है वह मंदिर के भीतर नहीं गया। सीढ़ियां पूरी पार कर गया, आखिरी बात रह गई।

अब न तू बचा न मैं बचा, अब तो नाच होने दो। अब तो नाचो। कभी तू के कारण न नाच सके, कभी मैं के कारण न नाच सके। अब तो दोनों न बचे, अब तुम्हें नाचने से कौन रोकता है ? अब कौन – सा बंधन है ? अब तो नाचो; अब तो रचाओ रास; अब तो होने दो उत्सव! अब क्यों बैठे हो ? अब लौट आओ!

~ ओशो ~ (अष्टावक्र महागीता, भाग #4, प्रवचन #48)

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