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आज अन्ना का मतलब एक अदभुत व्यक्ति, एक मसीहा, एक युग प्रवर्तक और एक युग द्रष्टा है, आज अन्ना कहलाना गर्व की बात है और हर व्यक्ति यह कह कर अपने-आप को गौरवान्वित महसूस करता है कि मैं अन्ना हूँ. अन्ना खुद हर व्यक्ति को अन्ना बनने की सलाह दे रहे हैं. अन्ना का मतलब आज वह जो आम आदमी के सोचने और कर सकने की दृष्टि से बहुत आने सोच सकने और कर दिखाने वाले व्यक्ति से है. एक ऐसा व्यक्ति जिसने सरकार की चूलें हिला दीं, जिसने पूरे सरकार को बेचैन कर दिया, जिसने जनता को नयी आवाज़ दी.

 

कुछ लोग इसे जनता का पहला वास्तविक आंदोलन बता रहे हैं, कुछ लोग राष्ट्र की आवाज़ और कुछ लोग दूसरा स्वाधीनता संग्राम. कई लोग सच्चे मायने में आज़ादी की शुरुआत मान रहे हैं. और अब सरकार द्वारा अन्ना की कथित मांग मान लेने के बाद तो जश्न का पूरा माहौल है जिसमे अब किसी तरह की कोर-कसार नहीं छुटी रह गयी है. ऐसे वक्त में बेसुरा राग गाने वाले को पागल ही कहते हैं और इसीलिए आगे मैं जो कहने जा रहा हूँ उसके लिए मुझे हर तरह का हमला झेलने को तैयार रहना चाहिए.

मैं पहली बात यह कहूँगा कि मेरी दृष्टि में इस आंदोलन से फायदे से अधिक, नुकसान हुआ है. सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि जिस तरह लगातार हमारे जनतंत्र के स्तंभों को खुलेआम नीचा दिखाया गया है वह किसी भी तरह से हमारे देश के लिए फायदेमंद नहीं है. अल्प अवधि में यह सब सोच कर किसी को बहुत अच्छा लगता है कि हमने संसद को नीचा दिखा दिया, प्रधानमंत्री को औकात दिखा दी, भीड़ में जो बोलना था बोल दिया, सबों की बोलती बंद कर दी आदि-आदि. पर सच्चाई यही है कि कोई भी संस्था बड़ी मेहनत के बाद बनती है, उसे नष्ट करने की कोशिश बहुत आसान है. इस रूप में और इस तरह से नेताओं को इस स्थान से अलग रख कर, उनके आने पर उन्हें भला-बुरा कह कर और उनके साथ बदसलूकी कर के हम बहुत कुछ हासिल नहीं कर रहे हैं. हम सभी जानते हैं कि प्रशासनिक व्यवस्थाओं में तमाम कमियां होती हैं और हमें उन्हें दूर करने के अनवरत प्रयास भी करने चाहिए पर इसका यह मतलब नहीं कि हम इस प्रशासनिक व्यवस्था से ही मुहं मोड़ लें.

यदि इतना बड़ा कुनबा चलाना हो तब किसी को आंटे-दाल का भाव मालूम होगा. दस दिनों के आंदोलन में अंत आते-आते लगभग हर किस्म की बातें अन्ना के मंच पर होने ही लगी थीं- शराब पी पर ओम पुरी आये ही थे, किरण बेदी ने अवांछनीय आचरण किया ही था, अन्ना के कथित समर्थकों ने पुलिस की पिटाई की ही थी, अनके दूसरे कथित समर्थकों ने इंडिया गेट की सडकों पर खुलेआम मोटरसाइकलों पर घूम पर आतंक फैलाया ही था. इसका कारण और कुछ नहीं मात्र यह था कि इंसान कमोबेश वही होता है और उसका स्वभाव भी काफी हद तक एक सा ही. ऐसे में यदि कहीं भी आवश्यकता से अधिक आजादी मिली कि उसका दुरुपयोग करने की प्रवृत्ति स्वतः बढ़ जाती है. ऐसे में हर स्थान पर एक अंकुश, एक व्यवस्था की जरूरत होती है. व्यवस्था में स्वाभाविक तौर पर कमियां भी होती हैं और उनके प्रति आक्रोश भी. पर इन कमियों के आधार पर यह मान लेना कि व्यवस्था ही गलत है या सड़-गल गयी है या पूरी तरह दूषित है, एक बहुत बड़ी अतिशयोक्ति होगी.

अगली बात यह कि व्यवस्था हमसे कोई अलग चीज़ नहीं होती, जो हम हैं वही व्यवस्था है. हममे कमियां है तो व्यवस्था में भी होगी. व्यवस्था चाक-चौबंद है तो हम भी चौकन्ने रहेंगे. अतः सभी स्थितियों के लिए मात्र व्यवस्था को दोषी ठहरा कर उससे अलग खड़े होने का प्रयास करना किसी भी तरह से वाजिब नहीं है. फिर हम इस बात पर आयें कि आखिर यह आंदोलन चाहता क्या था? बाह्य तौर पर यह आंदोलन भ्रष्टाचार के विरुद्ध था पर वास्तव में यह अन्ना की टीम द्वारा प्रस्तावित जन लोकपाल बिल को देश का कानून बनाए जाने के लिए एक खुला जोर आजमाइश था. इसके पीछे तर्क यह था कि टीम अन्ना ने जो बेमिसाल राम-वाण तैयार किया है वह सीधे भ्रष्टाचार को वेध देगा और इसके लिए अमोघ अस्त्र है. इस रूप में जन लोकपाल बिल और भ्रष्टाचार की लड़ाई को एक ही सिक्के के दो पहलुओं के रूप में स्वीकत लिया गया.

इस स्वीकारोक्ति और इस सोच में एक नहीं कइयों झोल हैं. मैं जानता हूँ कि इस बिल के बनाने में कई नामी-गिरामी कानूनविद, जो आज देश की कानूनी प्रक्रिया के सबसे बड़े नाम माने जाने लगे हैं, का दिमाग लगने की बात कही जा रही है. पर मैंने जितनी बार भी यह बिल का ड्राफ्ट पढ़ा मुझे ऐसा लगता जैसे किसी ने बैठे-बैठे अपनी कल्पना की तमाम उड़ानों को इसके साथ संबद्ध कर दिया हो. सबसे पहले जन लोकपाल नामक एक सुपरमैन की कल्पना की गयी और फिर शास्त्रास्त्र से लैस करने का उपक्रम शुरू हो गया. लोकपाल को फलां काम भी दो, लोकपाल को यह ताकत भी दो. ग्यारह लोगों का लोकपाल पूरे देश के करोड़ों सरकारी कर्मियों के भ्रष्ट आचरण पर भी निगाह रखेगा, उनके वार्षिक संपत्ति विवरण पर भी नज़र टिकाएगा, उनकी शिकायतों की जांच भी करेगा, उन पर मुक़दमा भी चलाएगा, इन मामलों में अभियोजन में भी सक्रियता रखेगा, जन शिकायतों को भी देखेगा, यदि किसी सरकारी कर्मी ने जन शिकायत निस्तारण में देरी की तो उसे दण्डित भी करेगा, लोगों के फोन भी टैप कराएगा और ना जाने क्या-क्या.

कहने का मतलब यह कि दुनिया में भ्रष्टाचार सम्बंधित कोई ऐसा काम नहीं होगा जो जन लोकपाल नहीं करेगा.कल्पना की इतनी ऊँची उड़ान तो शायद हौलीवुड वाले भी नहीं उड़ते होंगे और  अपने देश के मनमोहन देसाई तथा प्रकाश मेहरा भी, जिन्होंने अमिताभ बच्चन के रूप में एक महानायक तो बना दिया था पर जब वे भी बेसिरपैर की ऊँची उड़ान उड़ने लगे थे जनता ने नकारना शुरू कर दिया था. इस पर भी तुर्रा यह कि जन लोकपाल ये सारे काम ताबडतोड करेगा. हर काम ने लिए समय नियत है- कोई एक माह तो कोई छह महीने तो कोई एक साल. मुकदमों के निपटारे के लिए अलग समय सीमा. किसी चीज़ की हद होती है और जन लोकपाल सारी हदों के पार था. पर चूँकि मीडिया साथ में थी और जनता खुद ही पीछे-पीछे आना शुरू हो गयी थी, इसीलिए यह कागज़ की नाव भी बस तैरने लगी और खूब तैरी. सच पूछें तो यह कागज़ की नाव इस कदर तैरी है कि मेरी यादाश्त में इसके मुकाबले कोई भी चीज़ शोर मचा पाने में सफल नहीं हो सकी है. यह भी तब जब वह अत्यंत ही काल्पनिक, अव्यवहारिक और सैधांतिक हो. मैंने तो देखा था कि गणेश जी ने इस देश में एक दिन दूध पीया था पर देश की जनता मीडिया के जरिये सुबह-दोपहर-शाम लगातार इस कदर जन लोकपाल रुपी दूध का सेवन कर रही थी मानों यदि यह नहीं आया तो अब इंसान बच नहीं पायेगा. इसे जीने की बुनियादी जरूरतों में बता दिया गया और इस रूप में इस हद तक प्रचारित किया गया कि स्वतः ही अन्ना राष्ट्र की नयी ज्योति, टीम अन्ना राष्ट्र के नए कर्णधार और जन लोकपाल राष्ट्र का नया ग्रन्थ बन गया.

चूँकि दिल्ली का मामला और चौबीसों घंटे का अनवरत प्रदर्शन, लिहाजा कोई भी राजनैतिक दल इससे अछुते कैसे रह पाते. ताबडतोड मीटिंगे हुईं जिनमे कभी टीम अन्ना सरकारी मंत्रियों से मिल रहे थे तो कभी विरोधी दलों से. यह एक राष्ट्रीय पर्व बन गया था और इसमें हर किसी का शिरकत करना आवश्यक हो गया था. यह तो मैं इस देश के लिए बहुत बड़ा कल्याण का विषय मानता हूँ कि अंत में इस विषय पर संसद के दोनों सदनों में खुली बहस हुई जिसमे तमाम बातें और कई लोगों के विचार सामने आये. लेकिन यहाँ भी मीडिया का वर्ताव मुझे वैसा ही दिखा. जिसने अन्नागिरी की वह तो ठीक, जिसने अपना स्वतंत्र मत व्यक्त किया उसे तुरंत गलत ठहराना शुरू कर दिया गया. लेकिन फिर भी अंत में यह बात लगभग सभी महत्वपूर्ण भाषणों में आई कि किसी व्यक्तिगत जिद के आये झुक पर कोई भी ड्राफ्ट को देश का क़ानून बना दिया जाना किसी भी प्रकार से हितकर नहीं है. इस रूप में मुझे खास कर बहुजन समाज पार्टी के सांसद सतीश चन्द्र मिश्रा की यह बात बहुत अच्छी लगी कि यह बात अन्ना भी शायद नहीं चाहें कि कोई भी कानून बस ऐसे ही बिना पूरी तरह विचार किये बना दिया जाए जिसे अगले दिन ही मा० सर्वोच्च न्यायालय विधिविरुद्ध होने की दशा में खारिज कर दे. उन्होंने यह भी सही कहा कि इनकी पूरी बात कैसे मान ली जाए जब ये लोग स्वयं ही अपनी बात से जब-तब हटते रहे हैं और अपना स्वयं का ड्राफ्ट भी सुविधानुसार बदलते रहे हैं.

इसी तरह से सीपीआई एम के सीताराम येचुरी की बात में भी बहुत बल था कि एक ही बिल में और एक ही संस्था में सब कुछ समाहित कर देने की इच्छा कत्तई व्यावहारिक नहीं है. मुझे तो राजद मुखिया लालू यादव की यह बात भी सही लगी कि यह कोई आपातस्थिति नहीं है जिसमे नियमित प्रक्रिया को अकारण तोडा जाए या शरद यादव की यह बात कि इस मामले को मीडिया ने एक पक्षकार के रूप में प्रस्तुत किया जो अनुचित था. वरिष्ठ मंत्री प्रणव मुखर्जी का यह कथन कि मात्र एक क़ानून अथवा एक संस्था से भ्रष्टाचार दूर नहीं किया जा सकता तथा कॉंग्रेस महासचिव राहुल गाँधी का वक्तव्य कि लोकपाल अकेले कुछ नहीं कर सकता बल्कि हमें एक वृहद स्तर पर सुधार लाने होंगे, अपने आप में बहुत मायने रखते हैं. वरिष्ठ भाजपा नेता अरुण जेटली का यह कथन भी महत्वपूर्ण था कि सिविल सोसायटी की हर बात उसी रूप में नहीं मानी जा सकती या लोकपाल को फोन टैप करने का अधिकार देना अनुचित होगा.

इस तरह हम देखते हैं कि कई दलों के नेताओं ने आपस में बैठ कर जन लोकपाल की मांग से जुड़े कई पहलुओं को ना सिर्फ खारिज किया बल्कि उनकी त्रुटियों को भी सामने रखा. मैं इसके साथ एक बार फिर यह जोड़ना चाहूँगा कि यदि किसी भी दिन जिस रूप में अन्ना का जन लोकपाल सुझाया गया था, वह पारित हो गया होता तो वह अपनी अव्यावहारिकता, अतिशय शक्तिपरकता, एकपक्षीयता, अति विस्तारवाद के कारण हम लोगों के लिए एक भारी बोझ ही होता. बल्कि सच तो यह दिखता है कि हमें लोकपाल के स्थान पर व्यवस्था में मौलिक और अन्तर्निहित सुधारों की जरूरत है. जो सबसे बड़ी जरूरत मुझे दिखती है वह एक ऐसे कानून की जिसमे प्रत्येक सरकारी सेवक की जिम्मेदारी नियत किये जाने, उसके द्वारा अपना काम एक तयशुदा समय में पूरा करने और ऐसा नहीं किये जाने पर उसे जिम्मेदार मानते हुए उसके विरुद्ध कार्यवाही (अर्थदंड सहित) किये जाने के प्रावधान हों. लेकिन इसकी भी पहली जिम्मेदारी स्वयं विभाग में हो जहां प्रत्येक स्तर के अधिकारी के कार्यों को अगले स्तर के अधिकारी द्वारा देखे जाने और अपने काम में चूकने पर दण्डित करने तथा दण्डित करने चूक होने पर वरिष्ठ अधिकारी का उत्तरदायित्व नियत होने की व्यवस्था हो. इस पूरी प्रक्रिया के बाद ही मामला एक स्वतंत्र संस्था के पास जाए जो लोकपाल ना हो कर इसी कार्य हेतु बनी हुई संस्था हो.

जहाँ तक भ्रष्टाचार की लड़ाई है, वह कोई भी देश किसी एक संस्था को नहीं सौंप सकता. आज यदि हम लोकपाल को भ्रष्टाचार की पूरी लड़ाई का दायित्व सौंप दें और कल को वह खुद ही इसमें लिप्त हो जाए तो? कितने लोकपाल को हम हटाएंगे? और क्या किसी को हटाना इतना आसान होता है? एक चपरासी को तो सरकारी सेवा से अलग करने में दुनिया भर की दिक्कत होती है फिर एक शक्ति-संपन्न लोकपाल, क्या वह गाज़र का हलवा होगा जिसे जब चाहे, जो चाहे खा लेगा? इसीलिए हम भ्रष्टाचार की लड़ाई कोई एक संस्था बना कर नहीं लड़ सकते. हम इसे शासन-व्यवस्था में अतीव पारदर्शिता ला कर, सूचना के अधिकार को पूरी तरह फैला कर और इसे लगभग सार्वभौम बना कर ही दूर कर पायेंगे. लोकपाल तो मात्र एक और सरकारी यंत्र होगा- मर्जी हुई तो हुई, ना हुई तो नहीं सही. अंत में मैं यही कहना चाहूँगा कि हमें अन्ना के आंदोलन को इसकी पूरी सम्पूर्णता में देखना और समझना चाहिए, मात्र एकपक्षीय रूप में देखने से हम अन्ना को देवता तो बना दे रहे हैं पर इसका नतीजा ठन-ठन गोपाल ही रहेगा. आज के इस फील अमिताभगुड अवसर पर यह कहना अपने आप को खतरे में डालना है पर क्या करें- दिल है कि मानता नहीं.

लेखक अमिताभ आईपीएस अधिकारी हैं. इन दिनों मेरठ में पदस्थ हैं.

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