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लखनऊ : पीलीभीत जेल में सात कैदियों की पीट पीट कर हत्या के मामले को वापस लेने की हो न्यायिक जांच... यह बात आज एस.आर. दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट ने प्रेस को जारी बयान में कही है. ज्ञात हो कि 1994 में जब मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री थे तो पीलीभीत जेल में जेल स्टाफ द्वारा 28 टाडा कैदियों की बुरी तरह से पिटाई की गयी थी जिनमें से 7 कैदियों की मौत हो गयी थी. इसकी सीबीसीआईडी द्वारा विवेचना की गयी थी जिसमें 42 जेल कर्मचारियों के दोषी पाए जाने पर उनके विरुद्ध आरोप पत्र न्यायालय में प्रेषित किया गया था. इनमें से एक कर्मचारी को गिरफ्तार भी किया गया था.

2004 में शेष आरोपी कर्मचारी अपनी गिरफ्तारी के विरुद्ध उच्च न्यायालय चले गए थे और कोर्ट के आदेश से न्यायालय की कार्रवाही स्थगित हो गयी थी. उसके बाद राज्य की तरफ से स्थगन आदेश को समाप्त कराकर मुक़दमे को चालू करने के लिए कोई भी कार्रवाही नहीं की गयी. 2007 में जब मुलायम सिंह पुनः उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो अचानक सभी आरोपी कर्मचारियों जिनमें  यादव जेलर भी शामिल था, के विरुद्ध हत्या के उक्त मुक़दमे को जनहित में वापस ले लिया गया और सारी अदालती कार्रवाही बंद कर दी गयी.

अब जब पीलीभीत जिले में 1991 में फर्जी पुलिस मुठभेड़ में मारे गए 11 सिख यात्रियों के मामले में 42 पुलिस वालों को आजीवन कारावास की सजा हुयी तो जेल में मारे गए 7 कैदियों के आश्रितों ने इस मामले की वर्तमान स्थिति के बारे में पूछ पड़ताल शुरू की तो पता चला है कि उक्त मामला से सम्बंधित अभियोग को मुलायम सिंह सरकार द्वारा 2007 में वापस ले लेने के कारण वर्तमान में अदालत में कोई भी केस लंबित नहीं है. इस प्रकार यह स्पष्ट है की इस मामले में सरकार ने आरोपी जेल कर्मचारियों को जिन्हें सीबीसीआईडी ने दोषी पाया थे, के विरुद्ध मामले को जनहित में वापस लेकर राज्य की सत्ता और कानून का खुला दुरूपयोग किया गया है. यह मृतकों और उनके आश्रितों के साथ बहुत बड़ा अन्याय है और न्यायिक प्रक्रिया का उपहास है. अतः आइपीएफ मांग करता है कि इस मामले की न्यायिक जांच होनी चाहिए और आरोपी जेल कर्मियों के विरुद्ध केस चला कर उन्हें दण्डित किया जाना चाहिए. 

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