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Sanjaya Kumar Singh : योजना आयोग के साथ और उसके बिना... बहुत पुरानी बात है, कुछ लोग दिल्ली आए हुए थे और वापस जाने की उनकी ट्रेन पुरानी दिल्ली से थी। रास्ता एकसप्रेस बिल्डिंग होकर था और तय हुआ था कि मैं एक्सप्रेस बिल्डिंग से उनलोगों के साथ गाड़ी में सवार होकर स्टेशन जाउंगा और ट्रेन में बैठाकर वापस आ जाउंगा। चूंकि छोड़ने वाली गाड़ी को इसी रास्ते वापस लौटना था इसलिए मुझे उसी से वापस एक्सप्रेस बिल्डिंग आ जाना था। उस दिन ड्यटी क्या थी वह सब अब याद नहीं है पर उन दिनों हमलोग कहीं से भी घूम-फिर कर एक्सप्रेस बिल्डिंग पहुंच जाते थे ढाबे पर खाना खाते थे और ज्यादा देर हो जाए तो रात में कर्मचारियों को घर छोड़ने वाली कंपनी की गाड़ी से या किसी साथी के साथ बस से घर आ जाते थे। उन दिनों साथियों के पास दुपहिया भी अपवाद ही थे और डीटीसी की बस के अलावा कोई विकल्प नहीं था। देर सबेर जब आ जाती थी उसी में सवार होना होता था और रात में इक्का-दुक्का ही सही बसें चलती रहती थीं।

ऐसे में रात नौ बजे के बाद पुरानी दिल्ली से एक्सप्रेस बिल्डिंग लौटते समय किसी से मांगी हुई हमारी गाड़ी दरियागंज में खड़ी हो गई। पता चला कि तेल खत्म हो गया। मैंने कहा कि कोई बात नहीं दिल्ली गेट चौराहा पार करते ही बहादुर शाह जफर मार्ग पर पेट्रोल पंप है और वहां तेल मिल जाएगा। ड्राइवर गाड़ी छोड़कर जाने को तैयार नहीं था और मैं डब्बे में तेल लेकर वापस उसे देने क्यों जाता। जब वो गाड़ी छोड़ने को तैयार नहीं था तो मैंने कहा कि ठीक है मैं पैदल एक्सप्रेस बिल्डिंग निकल लेता हूं। ठीक से याद नहीं है, गाड़ी-ड्राइवर आने-जाने के रूट रास्ते, अनुमति का कोई चक्कर रहा होगा, ड्राइवर ने कहा कि चलिए साथ ही चलते हैं हमलोग कुछ दूसरे लोगों की सहायता से गाड़ी को धक्का लगाकर पेट्रोल पंप पहुंचे। वहां पता चला कि उस समय उस पंप पर डीजल मिलता ही नहीं था। अब एक तो बिना तेल की गाड़ी और ऊपर से घटिया तेल से चलने वाली जो बहादुर शाह जफरमार्ग के पेट्रोल पंप पर मिलता ही नहीं था। मुझे याद नहीं है, क्या कहकर मैं वहां से निकल लिया। ड्राइवर ने क्या किया मुझे ये भी नहीं पता। ना मैंने मालूम करने की कोशिश की।

अगले दिन मैंने दफ्तर में साथियों से चर्चा की तो पता चला कि दिल्ली में ज्यादातर पेट्रोल पंप डीजल नहीं बेचते क्योंकि उस समय दिल्ली में डीजल की प्राइवेट गाड़ियां न के बराबर थीं और डीटीसी की बसें अपने पंप से डीजल भराती थीं। सड़क पर निजी बसें भी न के बराबर चलती थीं। उसी दिल्ली में अब डीजल की टैक्सी रोकने पर बवाल हो रहा है। बीच में निजी बसें चलाने का प्रयोग हो चुका है और इसमें हजारों जानें जा चुकी हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि इसका कारण सरकारों की सोच दूरदर्शी होना नहीं है। विदेश से खरीदकर बेचे जाने वाले पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत देश में जरूरत, सुविधा, मांग और भुगतान क्षमता के अनुसार तय की गई थी। सबको पता है कि डीजल की कीमत खेती के लिए पंप सेट चलाने के मुख्य उद्देश्य से कम रखी गई थी और किसी नियम के अभाव में इससे टैक्सी (या गाड़ी चलाकर) पैसे कमाने या बचाने की कोशिश ने अधिकृत रूप ले लिया। यह तब हुआ जब देश में आजादी के बाद से ही योजना आयोग अस्तित्व में हैं। अब तो उसे भी खत्म कर दिया गया है। सरकारें तात्कालिक लाभ के लिए दूर की नहीं सोचती और अगर कोई सोचे तो तात्कालिक लाभ के लिए उसका मजाक भी बनाया जाता है। समझना जनता को है। नहीं तो भुगतना भी उसे ही है।

जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक कार्यरत रहे वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं...

Shivnath Jha उस पेट्रोल पम्प में मिलावट की खबर मैंने भी एक्सप्रेस में लिखा था, बाद में छापा पड़ा और २ महीने के लिए बंद। मैं वह रास्ता ही छोड़ दिया, कहीं "पकड़कर लपेट न दे क्योंकि उन दिनों उस पेट्रोल पम्प और एक्सप्रेस बिल्डिंग के बीच एकदम विरान या फिर कूड़ा कचरा और अशोक का ढाबा

Sanjaya Kumar Singh लपेट देने से याद आया। सुबह-सुबह एक बेड रॉल मिला था - जिसमें लड़की की लाश निकली थी। शायद Ravi Batra की फोटो थी। एकसप्रेस में पहले पेज पर छपी थी।

Ratish Kumar Singh पहले कार पेट्रोल से ही चलती थी। बीच में SUV क्रांति आ गई और डीज़ल गाड़ियाँ बाज़ार में छा गईं। आज आप किसी गाड़ी का रिव्यु पढ़ें तो ज्यादातर डीज़ल वर्शन का ही मिलेगा, पेट्रोल कोई पूछता ही नहीं, क्योंकि बिकता तो डीज़ल है। कारण सिर्फ एक है, लालच। सबको एक ही चिंता है - कितना देती है।

Shambhunath Shukla संजय खूब दूरंदेशी सोच और राजनीतिक कौशल के साथ तुमने यह पोस्ट लिखी है। तब पेट्रोल पंपों पर डीजल नहीं मिला करता था क्योंकि निजी वाहन पेट्रोल से चलते थे और डीजल की गाडिय़ां ज्यादातर सार्वजनिक उपयोग के लिए होती थीं। जैसे ट्रक व बसें आदि। शायद याद होगा कि तब डीएलवाई टैक्सियां भी पेट्रोल से ही चलती थीं। वजह यह थी कि तब तक सड़क पर गाडिय़ां नहीं के बराबर होती थीं। और पेट्रोल भी खूब सस्ता होता था। तब तक एंबेसडकर कार भी पेट्रोल से ही चलती थी। जब शुरू-शुरू में टाटा के कुछ वाहनों की देखादेखी हिंदुस्तान मोटर्स ने डीजल से चलने वाली कारें बनाईं तो लोग डीजल वाली कारों को हिकारत से देखा करते थे और मानकर चला जाता था कि हाई वे पर डीजल कार किसी को पास करने में फँस सकती है। कुल 15 साल पहले तक यही मानसिकता हुआ करती थी। मगर अब तो सारी मंहगी कारें डीजल से चलती हैं और सरकार ने डीजल कारों को पनाह दी तथा कहा कि चूंकि पेट्रोल कारें कार्बन मोनोआक्साइड बनाती हैं इसलिए वे अधिक प्रदूषण करती हैं और डीजल कारों को वरीयता दी गई। डीजल कारों की कीमतें पेट्रोल वाली कारों से लगभग लाख रुपये मंहगी आती हैं। शुरू-शुरू में पेट्रोल कारों को प्रदूषण प्रमाणपत्र लेना पड़ता था पर डीजल कारों को इससे छूट थी। पर अब ऐसी सोच वाली सरकार दिल्ली में आ गई जिसने डीजल कारों को झटका देना शुरू कर दिया। और एनजीटी भी डीजल के खिलाफ खड़ा हो गया। नए-नए कानून बन गए कि 2 हजार सीसी से ऊपर की कार दिल्ली में नहीं चलेगी या सिर्फ गैस वाली टैक्सियां ही चलेंगी अब कोई कोर्ट से पूछे कि अभी तक गैस वाली कारें बनी ही कितनी हैं कि वे डीजल का स्थान ले सकें। कोई भी अच्छी कार सीएनजी से नहीं चलती। अगर सरकार दिल्ली जैसी सुविधाएं दूसरे शहरों में विकसित करे तो कौन आएगा कोई अपनी गलियां छोड़कर इस सड़ी हुई दिल्ली में।
अब तुमने भी पूरे राजनीतिक अंदाज में किसी को बचा लिया और किसी को फंसा दिया।

Sanjaya Kumar Singh नहीं ऐसा नहीं है। एक ही पोस्ट में क्या-क्या लिखा जाए। सच तो यही है कि दिल्ली में सुविधाएं इतनी नहीं होती तो दिल्ली कौन आता। काश जागरण जनसत्ता जैसा निकल रहा होता (तब के) तब भी मैं कहां यहां आने वाला था। पर ऐसा कुछ ना होना है ना होगा।

Ratish Kumar Singh CNG/LPG सब बेकार है, जो पिकअप पेट्रोल में मिलता है वो और कहीं नहीं। कुछ इलेक्ट्रिक कारें भी हैं, देखने में खूबसूरत, लेकिन प्रैक्टिकल नहीं।

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