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आम हिंदुस्तानी पहले चौंकता है, फिर भौंकता है, फिर टोकता है, फिर रोकता है, फिर खुद चौंकाने वालों में शामिल हो जाता है। एक बार फिर ऐसा ही दोहराने जा रहा है। एक अंगरेजी अखबार ने चित्र समेत बड़ी खबर छापी है, जिसमें एक बेहद मोटी औरत अपने नग्न नितंब प्रदर्शित कर रही है। कुछ और औरतें भी कुछ न कुछ प्रदर्शित कर रही हैं। चित्र बड़ा है, पढ़ने वाले का ध्यान खींचता है। उसे चौंकाता है, लुभाता है।

 

दिल्ली में भी स्लटवॉकी होकर कुछ औरतें अपने नग्न नितंब, अपने स्तनों का प्रदर्शन कर एक स्त्रीत्ववादी वक्तव्य देंगी कि उन्हें उनके लिबास और अंगों के नाम से नीचा न किया जाए! यह नया स्त्रीत्ववादी आंदोलन होगा। इस तरह दिल्ली ग्लोबल मानचित्र पर आ जाएगी। इसमें कुछ भी बुरा नहीं है। आजाद हिंदुस्तान में सबको अभिव्यक्ति और पहनावे की आजादी है। ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में यह भी तो जरूरी है कि जो वहां है, वह यहां भी हो। कल की ‘थर्ड वर्ल्ड’ तुरंत ‘फर्स्ट वर्ल्ड’ बने, तभी आगे बढ़ा जा सकता है। जीडीपी आगे है। ‘सबसे आगे होंगे हिंदुस्तानी’ का नारा है, सारा जहां हमारा है। तब स्लटवॉक भी हमारा है। हमने क्या नहीं किया।
वहां ‘गे’ हुआ, तो यहां ‘गे समाज’ बना। वहां ‘गे’ समाज ने अपना दिन बनाया, तो यहां भी बन गया। वहां ‘लेस्बियन’ बना, तो यहां कौन पीछे रहने वाला था? वहां औरतों ने ‘थोंग’ पहना, तो यहां भी पहना। वहां ‘चीनी नूडल स्ट्रेप’ चला, तो यहां भी हो गया। इस भारत-भू पर वह सब कुछ हो सकता है, जो वहां होता है। वहां सिविल सोसाइटी थी, यहां भी हो गई। वहां तहरीर चौक था, तो यहां जंतर-मंतर ‘तकरीर चौक’ बन गया।
स्लटवॉक की परिभाषा क्या है, यह ‘लोकपाल क्या है’ से भी कठिन सवाल है। कनाडा में इसकी परिभाषा एक पुलिस वाले ने बनाई। जब कुछ औरतें कुछ असामान्य से अंग प्रदर्शन करने वाले कपड़े पहने जा रही थी, तो उस बंदे ने कमेंट मार दिया-क्या ‘स्लट’ कपड़े पहने हो जी! उसे कहां मालूम था कि इसके जवाब में ‘स्लटवॉक आंदोलन’ शुरू हो जाएगा। किसी को क्या मालूम था कि यह दिल्ली में आ जाएगा।
दिल्ली तमाशों का शहर है। मुंबई से आगे निकल रहा है, इसलिए हर चीज अब मुंबई की जगह दिल्ली में होने लगी है। ढेर सारे चैनल हैं। आप बस खबर दें, हाजिर हैं। लाइव कवरेज है, बहसें हैं, मुद्दे हैं और मजा है। और क्या चाहिए? स्लटवॉक होगा, तो उससे चौंकने वाले भौंकेंगे। विरोध भी कर सकते हैं। विरोध होगा, तो बड़ा सीन बनेगा। सरकार परेशान होगी, तो सीन बनेगा। पुलिस परेशान होगी, तो सीन बनेगा। चैनल वाले कहेंगे, वाह क्या सीन है!
स्लट क्या, शिटवॉक होगा। सब कुछ होगा। हम किसी से कम नहीं। लेकिन तब भी हम मौलिक हैं। हमारी नकल पश्चिम सात जन्म में भी नहीं कर सकता। यहां एक करोड़ करीब कन्याएं भ्रूणावस्था में मार दी जाती हैं। हर पांच सेकेंड में औरतें घरेलू या सार्वजनिक हिंसा, रेप का शिकार होती हैं। उन्हें ऑनर किलिंग में मार डाला जाता है। दहेज उन्हें मारता है। पश्चिम इनमें हमसे आगे नहीं जा सकता। जाए भी, तो हम सवाए निकलेंगे।
‘स्लट’ यानी हिंदी में फूहड़, कुलटा, ढीठ और कुतिया! कामिल बुल्के के अंगरेजी-हिंदी कोश में ‘स्लट’ के यही मायने दिए गए हैं। हमारा मर्दवादी समाज औरतों को इनसे भी आगे के शब्दों से संबोधित करता है। लेकिन कोई औरत वैसा ही बन अपना विरोध करने नहीं आती। कनाडा में पुलिस वाले ने कहा, तो वहां की औरतों ने सोचा कि वैसा ही बन पुलिस को जवाब दिया जाए।
अपने समाज में औरत आज भी कमजोर है। उसे ताकत भी दी गई, तो कमजोर औरतें उसका अपने हित में उपयोग नहीं कर पाती हैं। उसका उपयोग भी ताकतवर औरतें ही करती हैं। यह दो दुनियाओं का फर्क है, जिसे ‘जैसे वो वैसे हम’ से नहीं ढांपा जा सकता। अतिचार का प्रतिकार अगर ‘फैशन स्टेटमेंट’ होता, तो वह कब का दूर हो गया होता! लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी है। ‘स्लटवॉक’ से ‘शिटवॉक’ तक की आजादी है। चौंकिए या भौंकिए, एक खबर यह भी सही!

जाने-माने विश्लेषक सुधीश पचौरी का कालम, जो कई अखबारों में प्रकाशित होता रहता है, को साभार यहां प्रकाशित किया गया है.

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