जनपद बदायूं के बिसौली विधान सभा क्षेत्र से बसपा विधायक उमलेश यादव को पेड न्यूज के मामले में दोषी करार देते हुए चुनाव आयोग ने बर्खास्त कर दिया है। वह वर्ष 2007 के विधान सभा चुनाव में राष्ट्रीय परिवर्तन दल से निर्वाचित घोषित की गयी थीं और बसपा सरकार बनने पर राष्ट्रीय परिवर्तन दल का बसपा में विलय कर दिया गया था, तब से वह बसपा में ही हैं। उनके प्रतिद्वंद्वी प्रत्याशी योगेन्द्र कुमार गर्ग उर्फ कुन्नू बाबू ने बिंदुवार शिकायत कर उनके निर्वाचन को आयोग में चुनौती दी थी, जिस पर लंबी सुनबाई के बाद उन्हें दोषी करार देते हुए बर्खास्त किया गया है। आयोग के इस महत्वपूर्ण फैसले पर अधिकांश लोग स्तब्ध हैं, क्योंकि भ्रष्टाचार के दौर में ऐसे फैसलों की अपेक्षा जनता अब कम ही करती है, तभी खबर आते ही चारों ओर न्याय और ईमानदारी की चर्चा होने लगी। इस फैसले से आम जनता का आयोग के प्रति विश्वास और बढ़ गया है, जो सबसे अच्छी बात कही जा सकती है।

उमलेश यादव की पहचान धनबली व बाहुबली बसपा विधायक डीपी यादव उर्फ धर्मपाल यादव की पत्नी के रूप में ही की जाती रही है, जबकि वैधानिक दृष्टि से उमलेश यादव उनकी पत्नी नहीं हैं, क्योंकि वर्ष 1989 में गाजियाबाद के सीजेएम न्यायालय से दोनों का तलाक हो चुका है। आश्चर्य की बात यह है कि तलाक के बाद भी दोनों के रिश्ते में किसी तरह का कोई परिवर्तन नहीं आया है। उमलेश यादव का पति डीपी यादव के प्रति पहले जैसा ही सम्मान है और डीपी यादव भी भारतीय पतियों की तरह ही उन्हें पत्नी के रूप में सम्मान देते नजर आते हैं और सुशील गृहणी बताते हुए उनकी सार्वजनिक तौर पर तारीफ करते रहते हैं, पर सवाल यह है कि दोनों के भाव में जब कोई परिवर्तन नहीं है और रिश्ते में किसी तरह की कोई कड़वाहट नहीं है, तो फिर तलाक क्यूं लिया गया?

इस सवाल पर सूत्रों का कहना है कि आपराधिक छवि प्रचारित होने के कारण कानूनी तौर पर परिवार सुरक्षित रहे और किसी तरह की कानूनी कार्रवाई होने पर उमलेश यादव स्वयं को वैधानिक तौर पर अलग होने का तर्क दे सकें, साथ ही संपत्ति के मुद्दे पर भी अलग परिवार दर्शा कर किसी भी तरह से कानूनी शिकंजे में फंसने से बच सकें, इसलिए कानूनी तौर पर अलग हो गये। अगर ऐसी ही सोच थी, तो उनकी सूझबूझ की दाद ही देनी पड़ेगी, क्योंकि कानूनी तौर पर अलग होने के कारण वह समय-समय पर कानूनी शिकंजे से उमलेश यादव बचती रही हैं, जबकि तलाक दिये बिना यह संभव नहीं था।

खैर, यह उनका अपना व्यक्तिगत निर्णय है और वह अपना जीवन किसी भी तरह जीने को स्वतंत्र हैं, लेकिन सवाल यह है कि जब वह वैधानिक तौर पर पति-पत्नी नहीं हैं, तो नामांकन भरते समय दोनों एक-दूसरे का उल्लेख क्यूं करते हैं? इस बिंदु पर गहनता से जांच होनी चाहिए, क्योंकि दोनों मिल कर कानून का दुरुपयोग ही कर रहे हैं। हालांकि योगेन्द्र कुमार गर्ग द्वारा की गयी शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया था, जिसकी सदस्यता खारिज होने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

लेखक बीपी गौतम मान्‍यता प्राप्‍त स्‍वतंत्र पत्रकार हैं. जनपक्षधर एवं शुचितापरक पत्रकारिता के हिमायती हैं तथा सभी विषयों पर बेबाक लेखन करते रहते हैं.

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