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धार्मिक और आध्‍यात्मिक प्रतीकों तथा आस्‍थाओं का सनातन पर्व महा-कुम्‍भ विवादों में आ गया है। प्राचीनतम परम्‍पराओं में पवित्रताओं के सवालों और बदलावों के प्रवाहों में जबर्दस्‍त रोड़े पड़ गये हैं। व्‍यवस्‍था और हठों के बीच जिद दीवार इतनी ऊंची हो गयी है कि हजारों साल पुराने दुनिया के इस महानतम अनुष्‍ठान के आयोजन पर राहु-दृष्टि कलंकित कर चुकी है। शायद इस बार यह पहला मौका है जब धर्म-संस्‍थापनार्थ सदियों पहले आचार्य-शंकर द्वारा बनायी गयीं 4 पीठों में से एक पीठ के जगद्गुरू शंकराचार्य ने बाकायदा इस आयोजन को विरोधस्‍वरूप अलविदा कह दिया। तय हो चुका है कि द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्‍वामी सरूपानंद सरस्‍वती अब इस बार के आयोजन में शरीक नहीं होंगे। हालांकि प्रशासनिक और सरकारी तौर पर यही कहा जा रहा था कि स्‍वारूपानंद जी को कुम्‍भ में वापस बुलवाने की भरसक कोशिशें चल रही हैं। लेकिन आज मुख्‍यमंत्री ने ऐलान कर दिया कि नई परम्‍परा की गुंजाइश ही नहीं।

तो पहले बात कुम्‍भ से। पुराणों के मुताबिक यह दैवीय ही नहीं, ईश्‍वरीय अनुष्‍ठान भी है जो हिन्‍दू आस्‍थाओं का प्राचीनतम कर्मकाण्‍ड माना जाता है। मानव के अस्तित्‍व से भी प्राचीन। पांडितों के मुताबिक ब्रह्मांड स्‍वयं कुम्‍भ है। जनश्रुतियों के अनुसार यह समुद्र-मन्‍थन है जिसे मंदिराचल को मथानी की तरह इस्‍तेमाल करने के लिए देवताओं ने सर्प-राज शेषनाग को रस्‍सी की तरह मथा था। इस दौरान पृथ्‍वी और मंदराचल के बीच संतुलन बनाये रखने के लिए स्‍वयं भगवान विष्‍णु ने खुद को कछुआ का रूप धारण कर दिया था। इसी मथ-कर्म के दौरान मक्‍खन की तरह लक्ष्‍मी, एरावत, विष और अमृत समेत अनेक दैवीय-तत्‍व प्राप्‍त हुए। जिसे देवताओं ने प्राप्‍त कर अपने अभियान को मजबूती दिलायी। लेकिन जिस विष का प्रयोग करने महादेव शंकर महादेवाधिदेव कहलाए गये, लेकिन विष को कुंभ में अब इस बार अमृत निकालने के बजाय राहु के रास्‍ते पर अड़ंगा लग रहा है। कुम्‍भ-मंथन की गति अब पलायन की ओर है। कुम्‍भ-क्षेत्र में चारों शंकराचार्यों को एकसाथ जुटाने वाली उनके चतुष्‍पथ प्रस्‍ताव को सिरे से खारिज किया जा चुका है। और इससे खफा हुए स्‍वारूपानंद ने कुम्‍भ छोड़कर मध्‍यप्रदेश का रास्‍ता पकड़ लिया है।

दरअसल, आर्यावर्त में हिन्‍दूधर्म की एकजुट पताका उठाने वाले शंकराचार्य कहलाये गये आचार्य शंकर ने अपने कुल 32 वर्ष की आयु में आचार्य शंकर ने देश के चारों कोनों पीठ स्‍थापित की थीं, जिनका नाम है ज्‍योतिषपुर, श्रृंगेरी, गोदावरी और द्वारिका। 89 बरस के शंकराचार्य स्‍वामी स्‍वारूपानंद सरस्‍वती द्वारिका के पीठाधीश्‍वर हैं। उनका दावा है कि वे ज्‍योतिषपुर यानी उत्‍तराखंड स्थित बद्रिका या बद्रीनाथ पीठ के भी अधीश्‍वर हैं। बस यहीं से पूरा विवाद है जिसका असर मौजूदा कुम्‍भ पर पड़ रहा है। 2 दिसम्‍बर-1924 को मध्‍यप्रदेश के सीवनी में जन्‍मे स्‍वारूपानंद ने 11 उम्र में वैराग्‍य लिया और तीर्थ-भ्रमण के बाद काशी में वेद-वेदांगों का अध्‍ययन किया। सन-42 में वे स्‍वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और 9 व 6 महीनों के लिए जेल भी गये। 26 मई 82 में द्वारिका पीठ के शंकराचार्य बने। उन्‍हें यह गद्दी उनके गुरू अनिर्वाणचिद्दानंद आचार्य के बाद मिली थी। लेकिन उनके शिष्‍य स्‍वामी अविमुक्‍तेश्‍वरानंद बताते हैं कि उसके पहले ही 7 दिसम्‍बर-73 में ही उन्‍हें ज्‍योतिषपुर पीठ का शंकराचार्य बनाया जा चुका था। लेकिन जानकार बताते हैं कि ज्‍योतिषपुर पीठ मामले में स्‍वारूपानंद ने एक मुकदमा वाराणसी की अदालत में दायर किया था कि इस पीठ के शीर्ष पर वासुदेवानंद स्‍वामी नहीं है, बल्कि वे खुद हैं। यह मुकदमा अभी तक चल रहा है।

तो, पहले बात अब ज्‍योतिषपुर पीठ पर। बद्रीनाथ यानी बद्रिकानाथ का नाम वास्‍तविक ज्‍योतिष मठ है, जो आमतौर पर जोशीमठ ही कहा जाता है। इसी नाम पर यहां एक बस्‍ती भी बसी हुई है। इलाहाबाद के ही एक प्रमुख विद्वान पंडित जुगुल किशोर तिवारी के पास कुछ दस्‍तावेजों मौजूद हैं, जो 18 दिसंबर-1952 को लिखे गये थे। तब स्‍वामी ब्रह्मानंद सरस्‍वती 108 महाराज पीठाधीश्‍वर बद्रिका आश्रमपीठाधीश्‍वर थे। तो जरा इन कागजों पर अब एक नजर। पंडित तिवारी के मुताबिक इस दिन इटावा के एक वकील कृष्‍णगोपाल चौधरी ने दिल्‍ली में कैनिंग लेन की 7 नम्‍बर कोठी में यह डीड लिखवाई थी। कागजों के मुताबिक पिछले सन 1800 के पहले तक ज्‍योतिषपीठ की परम्‍परा थी लेकिन छिन्‍न-भिन्‍न हो चुकी थी। वहां तक पहुंचने का रास्‍ता तक नहीं था। पीठ के नाम कुछ जमीन सरकारी अभिलेखों में दर्ज थी, जहां एक छोटी बस्‍ती बसी हुई थी। लेकिन वह ज्‍योतिषपुर पीठ के बजाय अपभ्रंश होकर जोशीमठ बन चुकी थी। किसानों का कब्‍जा था। ब्रह्मानंद शंकराचार्य के मुताबिक वहां पीठ के प्रतीक-प्रमाण चिन्‍ह मौजूद थे, मसलन ढाई हजार साल पुराना एक विशाल शहतूत का पेड़। डीड के मुताबिक तब के शंकराचार्य ब्रह्मानंद के चलते वहां के डीएम सर जेम्‍स क्‍ले ने पीठ की जमीन पर काबिज किसानों को मुआवजा दिलवाया और पीठ को जमीन वापस सौंपी दिलायी।

डीड के मुताबिक काशी के हुई धर्मसभा के नवीं अधिवेशन में पुराण प्रतीक, चिन्‍ह आदि को प्रमाणित करके जोशीमठ के पास, बद्रीनाथ, में मंदिर निर्माण दरभंगा नरेश की अध्‍यक्षता में हुआ। उत्‍तराधिकारी के तौर पर 108 दंडी स्‍वामी शांतानंद सरस्‍वती को बनाया ताकि कोई विवाद न हो। इसमें उत्‍तर भारत के श्रेष्‍ठ, विचार-आचार, भाषा, संस्‍कार और दंडी संन्‍यासी का चयन शांतानंद का हुआ। इसमें मठ के उत्‍तराधिकार के अलावा उसके कर्तव्‍य, धन-सम्‍पत्ति आदि का खुलासा गुरू ने किया। 20 मई-53 में ब्रह्मानंद ब्रहमलीन हुए तो शांतानंद को पीठाधीश्‍वर बना दिया गया। इस बारे में इलाहाबाद के डीएम ने शांतानंद को इस बारे में एक प्रमाणपत्र भी जारी कर दिया। अविमुक्‍तेश्‍वरानंद स्‍वामी बताते हैं कि इसमें गड़बड़ हुई। हरिहरानंद कारपात्री ने एक कमेटी का आधार बनाकर इलाहाबाद के जज के यहां नालिश कर दी। जो 20 अक्‍तूबर-55 को खारिज हो गयी। मामला हाईकोर्ट पहुंचा लेकिन 31 जुलाई-59 को भी खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपील हुई तो कोर्ट ने एक निपटाना समिति बना दी, जिसकी सुनवाई अभी जारी है। अविमुक्‍तेश्‍वर बताते हैं कि ब्रह्मानंद सरस्‍वती के निधन के बाद व्‍यवस्‍था के लिए बनी ज्‍योतिषमठ नामक एक अंतरिम कमेटी बनी जिसमें स्‍वारूपानंद भी मौजूद थे। कारपात्री जी को शांतानंद के चयन पर ऐतराज था। विवाद अभी तक है।

इसी बीच, 7 दिसंबर-73 को स्‍वारूपानंद को ज्‍योतिषपीठाधीश्‍वर बनाने की कवायद हुई। सन-89 में निचली अदालत में मामला उठा। अवितेश्‍वर स्‍वामी के मुताबिक बाद में कोर्ट ने कोई ठोस कार्रवाई तो नहीं की, लेकिन अंतरिम तौर पर तय किया कि फैसला होने तक वासुदेवानंद को इस पीठ का आधीश्‍वर नहीं कहा जाए। सारा विवाद यही है। अब इस मौजूदा कुंभ में स्‍वारूपानंद ने एक नई परम्‍परा बनाने की मांग की कि धर्म-पुनर्संस्‍थापना में शुचिता के लिए चतुष्‍पथ बनाया जाए ताकि चारों शंकराचार्य आमने सामने बात करें और धर्म-आध्‍यात्‍म पर बात करते हुए जनता का मार्गदर्शन करें। लेकिन यह हो कैसे, जब चारों शंकराचार्य हैं ही नहीं। जाहिर है कि दो शंकरपीठों पर मामला विवादित है। यानी स्‍वारूपानंद सीधे दो पीठ पर आधीश्‍वर बनें। बाकी को यह मंजूर नहीं। सभी 13 अखाड़ों को भी नहीं। एक को छोड कर। मंडलाधीश्‍वरों को भी नहीं। अपने पक्ष में स्‍वारूपानंद की मौजूदा शंकराचार्य संख्‍याओं पर सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं कि ओछी राजनीति के चलते आज चार के बजाय 121 से ज्‍यादा शंकराचार्य मौजूद हैं जो दंबगई कर रहे हैं। कहां तक बात हुई है कि कई कथित शंकराचार्य आतंकवादी मामलों में लिप्‍त रहे हैं। यानी, इनके अस्तित्‍व पर भी शक है। लेकिन इस बारे में तय कौन करे। अपने-अपने तर्क हैं। कोई कहता है कि शंकराचार्य इस विवाद से अखाड़़े दूर ही रहें, जबकि अखाडे कहते हैं कि शंकराचार्य खुद कुम्‍भ से दूर रहें। यानी, कुम्‍भ पर धर्म-आध्‍यात्‍म को लेकर बाकायदा मजाक हो रहा है।

ऐतिहासिक तर्क है कि शंकराचार्य 788 में जन्‍मे, जबकि कुछ लोग दावा करते हैं कि शंकराचार्य का जन्‍म अब तक के ईपू 2519 है। यानी विवाद खूब हैं। शंकराचार्यों पर राजनीतिक लेबल होने को लेकर भी झंझट है। जाहिर है, मथने के बजाय अब सड़ रही है महापर्व कुम्‍भ परम्‍परा। प्रशासन ने तय किया है कि शंकराचार्यों और नयी परम्‍पराओं का स्‍थान नहीं, आस्‍थाओं से जुड़े लोगों का सम्‍मान सर्वाधिक है। चाहे वह है शेषनाग, मंदिराचाल, या कछुआ। हर कुम्‍भ पर जनमानस ही अमृत-मक्‍खन पर निकालता है। शंकराचार्य तो सिर्फ मक्‍खन वितरित करते हैं। जाहिर है कि महत्‍वपूर्ण है करोड़ों श्रद्धालु जनता, न कि तीन या चार शंकराचार्य, जिनकी गद्दी का झगड़ा है। यानी, पहले हमें मक्‍खन निकालने की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। खैर, तसल्‍ली की बात यह है कि आम श्रद्धालु को अब इससे कोई मतलब नहीं है कि शंकराचार्य या अखाड़ा कौन नेतृत्‍व करे, उसका तो ध्‍यान तो केवल इस पर है कि इस बार गंगा की धार कितनी स्‍वच्‍छ होगी। और अब यह होगी जरूर। उत्‍तराखंड से 20 दिन पहले छोड़ी गयी गंगा की अतिरिक्‍त धार कुम्‍भ के ठीक पहले यानी 13 जनवरी-13 तक गंगा-यमुना-सरस्‍वती के संगम प्रयाग के रास्‍ते पर है। और तब ही होगा इस कुम्‍भ का अंतिम कर्मकांड, जिसका सर्वोच्‍च स्‍थान श्रद्धालु ही होता है, शंकराचार्य नहीं।

लेखक कुमार सौवीर यूपी के जाने माने और वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क या 09415302520 के जरिए किया जा सकता है. यह लेख डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट में प्रकाशित हो चुका है.

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