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बौद्धिक वर्ग से रिश्ते सुधारे मोदी सरकार, अच्छी नीयत से किए गए कामों को भी चाहिए लोकस्वीकृति

अपने कार्यकाल के दो साल पूरे करने के बाद नरेंद्र मोदी आज भी देश के सबसे लोकप्रिय राजनीतिक ब्रांड बने हुए हैं। उनसे नफरत करने वाली टोली को छोड़ दें तो देश के आम लोगों की उम्मीदें अभी टूटी नहीं हैं और वे आज भी मोदी को परिणाम देने वाला नायक मानते हैं। देश की जनता से साठ माह में राजनीतिक संस्कृति में परिर्वतन और बदलाव के नारे के साथ इस सरकार ने 24 माह में अपनी नीयत के जो पदचिन्ह छोड़े हैं, उससे साफ है कि सरकार ने उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार को रोकने और कोयले, स्पेक्ट्रम जैसे संसाधनों की पारदर्शी नीलामी से एक भरोसा कायम किया है। देश की समस्याओं को पहचानने और अपनी दृष्टि को लोगों के सामने रखने का काम भी बखूबी इस सरकार ने किया है। राज्यसभा के विपरीत अंकगणित के चलते कुछ जरूरी कानून जैसे जीएसटी अटके जरूर हैं, किंतु सरकार की नीयत पर अभी सवाल नहीं उठ रहे हैं।

इस सरकार का सबसे बड़ा संकट शायद कामकाज, पारदर्शिता और नीयत के बजाए छवि का है। सरकार के मुखिया की छवि इस तरह से पेंट की गयी है कि उससे उन्हें निकालना काफी मुश्किल हो रहा है। मोदी आज भी अपनी उसी गढ़ी गयी छवि और लंबी छाया से लड़ रहे हैं। प्रधानमंत्री बनने के पहले मोदी के खिलाफ एक लंबा अभियान चला। जिसके तहत उनकी छवि कट्टर प्रशासक, तानाशाह, मीडिया से दूरी रखने वाले, अफसरशाही को तरजीह देने वाले, राजनीतिक प्रतिद्वंदियों को समाप्त कर डालने वाले और मुस्लिम विरोधी राजनेता की बनी या बनाई गयी। इमेजेज और रियलिटी के इस संकट से उनकी सरकार आज भी दो-चार है। देश के बौद्धिक तबकों से उनकी दूरी, संवाद का संकट इस समस्या को और गहरा कर रहा है। देश के बौद्धिक तबकों, गुणी जनों से उनकी और केंद्र सरकार की दूरियां साफ नजर आती हैं। इस तबके के एक बड़े हिस्से ने क्योंकि उनके खिलाफ एक लंबा अभियान चलाया और उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं थे, इसलिए यह दूरियां और बढ़ गयी हैं। दोनों तरफ से संवाद को बनाने और संकट का हल निकालने के बजाए तमाम तरह के विरोध प्रायोजित किए गए, जिससे समस्या और गहरी हो गयी। जैसे पुरस्कार वापसी के सिलसिले को मोदी सरकार के खिलाफ एक सुनियोजित अभियान ही माना गया। इसी तरह दादरी के मामले को जिस तरह पेश किया गया और फिर जेएनयू से लेकर हैदराबाद तक ये लपटें फैलीं।

यहां यह देखना बहुत महत्व का है कि ये वास्तविक संकट थे या प्रायोजित किए गए। कई मामलों में सरकार को इन प्रायोजित विवादों से खुद को बचाने के सुनियोजित यत्न करने चाहिए। हमें पता है कि मोदी के राजनीतिक विरोधियों के अलावा बुद्धिजीवियों में भी एक बड़ा तबका उनके खिलाफ है। उसके पीछे विचारधारा की प्रेरणा हो या कुछ और किंतु यह है और पूरी ताकत से है। नरेंद्र मोदी सरकार के प्रबंधकों की इस मामले में विफलता ही कही जाएगी कि वे बौद्धिक तबकों के एक हिस्से द्वारा रचे जा रहे इन षडयंत्रों का बौद्धिक तरीके से जवाब नहीं दे पाए। इसका सबसे बड़ा कारण बौद्धिक वर्गों के बीच आज भी भाजपा और संघ परिवार की स्वीकृति उस रूप में नहीं है, जैसी होनी चाहिए। इस दौर का लाभ लेकर जिस प्रकार के बौद्धिक योद्धा और नायक खोजे जा सकते थे, उस दृष्टि का इस सरकार में खासा अभाव दिखता है। समूचे बौद्धिक वर्ग और मीडिया को अपना शत्रु पक्ष मानना भी इस सरकार के शुभचिंतकों की एक बड़ी भूल है। संवाद की शुरूआत और संवाद की निरंतरता से इस खाई को पाटा जा सकता है, क्योंकि मैदानी क्षेत्र में सफलताओं के झंडे गाड़ता संघ परिवार अगर बौद्धिक क्षेत्र में पटखनी खा रहा है, तो उन्हें इस ओर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। यह भी स्वीकारना होगा कि कोई भी सरकार छात्रों और बुद्धिजीवियों से कटकर, खुद के लिए संकट ही पैदा करेगी। इन्हें शत्रु मानना तो बिल्कुल ठीक नहीं है। इन वर्गों को साथ लेना ही किसी भी समझदार नेतृत्व का काम होना चाहिए।

विचारधारा के संकट अलग हैं, किंतु बौद्धिक तबकों का नेतृत्व बौद्धिक क्षेत्र से ही आएगा। वहां दोयम दर्जे के चयन संकट ही खड़ा करेंगें। सत्ता का लाभ लोगों को अपना बनाने के लिए हो सकता है, किंतु बहुत अड़ियल रवैये और खूंटे गाड़ने से बौद्धिक वर्गों की स्वीकार्यता और समर्थन नहीं पाया जा सकता। इसलिए सड़क, बिजली, पानी, अधोसंरचना से जुड़े कामों के अलावा बौद्धिक चेतना का सही दिशा में निर्माण भी एक जरूरी काम है। योग्य व्यक्तियों को योग्य काम देकर ही परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। यह भी मानिए कि बौद्धिक तबकों,कलावंतों के बीच बहुत संगठनात्मक हठधर्मिता भी स्वीकार्य नहीं है, उन्हें उनके लक्ष्य बताकर खुला छोड़ना पड़ता है। यह सोच भी गलत है कि सारे बौद्धिक वामपंथी हैं और एक मरी हुयी विचारधारा से चिपके हुए हैं। संगठनात्मक आधार पर इन क्षेत्रों में वामपंथी संगठन सक्रिय थे, इसलिए उनकी इस तरह की सामूहिक शक्ति ज्यादा दिखती है। इस क्षेत्र में संघ परिवार का प्रवेश नया है किंतु ज्यादातर बुद्धिजीवी स्वतंत्र सोच के हैं और उन्हें अपने साथ जोड़ा जा सकता है। शायद वे संगठनात्मक रूप से उतने सक्रिय न हों किंतु समाज में उनकी बड़ी जगह होती है। उनकी संवेदना, सोच के लिए स्वायत्तता एक अनिवार्य तत्व है, जिसे प्रशासनिक तलवारों और नौकरशाही की जड़ताओं से मुक्त रखना जरूरी है। कांग्रेस से पूरा न सीखें तो भी बौद्धिक तबकों से डील करने की उनकी शैली के कुछ तत्व अपनाए जा सकते हैं। यह भी ध्यान रखना होगा कि इस मामले में मीडियाकर का चयन लाभकारी नहीं हो सकता, आपको अंततः एक्सीलेंस पर ही जाना होगा।

जनसंपर्क, आत्म-प्रचार, हावी नौकरशाही और पार्टी में व्यक्तिपूजा से कोई भी लोकनायक जितनी जल्दी मुक्त हो जाए, उसे उतनी ही स्वीकार्यता मिलती है। पिछली सरकारों की विफलता के उदाहरणों को देते हुए, आप अपनी सरकार को सफल करार नहीं दे सकते। यह बात कई बार देखी और सुनी गयी है कि अच्छे कामों के बाद भी सरकारें हार जाती हैं। अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार इसका उदाहरण है। इसका सबसे बड़ा कारण यही होता है कि आपके काम लोगों तक नहीं पहुंचे और यदि पहुंचे तो आपकी नीयत पर सवालिया निशान लगे।

मोदी सरकार का सबसे बड़ा संकट यह है कि उसमें अपेक्षित विनम्रता का अभाव है। हर आरोप पर हमलावर हो जाना सरकारों का गुण नहीं है, मंत्रियों का गुण नहीं है। हर असहमति के स्वर को अपने ऊपर आरोप समझना भी ठीक नहीं है। मोदी और उनकी सरकार को हमेशा यह समझना होगा कि उनके विरोधी बहुत चतुर, चालाक, मीडिया चपल और नान इश्यू को इश्यू बनाने वाले लोग हैं। उनके जाल में हमेशा फंस जाना ठीक नहीं है। लोकसभा चुनावों के पहले तक भाजपा एजेंडा सेट कर रही थी और देश उस पर बहस करता था। आज क्या कारण है कि विरोधी एजेंडा सेट कर रहे हैं और सरकार उसमें फंस रही है। प्रत्यक्ष सरकार में शामिल लोग भी क्यों विवादों में उलझ रहे हैं और अपनी मर्यादा का हनन कर रहे हैं। भाजपा के रण बांकुरों को सत्ता में होने के मायने और सत्ता की मर्यादाएं भी सीखनी चाहिए।

बावजूद इसके इस सरकार को निश्चय ही इस बात का श्रेय है कि उसने अवसाद और निराशा से भरे देश में उम्मीदें जगाने का काम किया है, मोदी ने राष्ट्र को उर्जावान नेतृत्व दिया है। नीति पंगुता के स्थान पर निर्णय क्षमता ने लिया है। संसद की उत्पादकता में वृद्धि हुयी है। नवाचारों और अपनी गति से नव मध्यवर्ग का प्यार भी पाया है, किंतु क्या किसी सरकार के लिए इतना काफी है? क्या उसे समाज के बौद्धिक तबकों, कलावंतों को छोड़ देना चाहिए? जबकि यह वर्ग समाज का प्रभावी वर्ग है, उसकी राय और सोच का प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। उसे सुधारने का यह सही समय है। यह देश सबका है, सभी विचारों के लोग मिलकर इस देश को बनाने में अपना योगदान दें, यह सुनिश्चित करना भी नेतृत्व का ही काम है। देश के एक  बड़े बौद्धिक वर्ग ने निश्चित ही मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए अभियान चलाए, कुछ ने देश छोड़ने की धमकी दी। किंतु जनता-जर्नादन के फैसले के बाद अब बारी सरकार और उसके प्रबंधकों की है कि वे दिल बड़ा करें और ‘सबका साथ-सबका विकास’ का अपना नारा जमीन पर भी उतारें। किसी भी समाज के गुणीजनों से सत्ता की दूरी न तो देश के ठीक है न ही समाज के लिए। दोनों पक्षों में संवाद ही निरंतरता ही लोकतंत्र को जीवंत बनाती है।

(लेखक संजय द्विवेदी माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल में प्रोफेसर हैं.)

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