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दामिनी रेप कांड के विरोध में रायसीना हिल्स पर भीड़ के सैलाब ने सरकार और खुफिया तंत्र को हिलाकर रख दिया है। सरकारी मशनीरी हैरत में है कि बिना किसी नेतृत्व के इतनी बड़ी तादाद में जनता सिर्फ सोशल मीडिया के जरिये एकजुट हुए और राष्ट्रपति भवन के पास तक आक्रोश जाहिर करने पहुंच गये। सरकार और खुफिया तंत्र की ओर से सोशल मीडिया को खतरे के तौर पर देखा जा रहा है। इससे निपटने के लिए भी व्यापक विचार विमर्श इंटेलीजेंस और सरकार के बीच शुरू हो चुका है। माना जा रहा है कि देश के राजनीतिक और सांप्रदायिक माहौल को बिगाडऩे के लिए भविष्य में भी सोशल मीडिया अहम् भूमिका निभा सकता है। सुरक्षा के लिहाज से सोशल साइटें एक नयी चुनौती बनकर सरकार के सामने खड़ी हैं। इस बात की आशंका सोशल मीडिया साइटों पर निगरानी रखने वाली सरकारी एजेंसी ने जाहिर की है। रिपोर्ट में कहा गया है उग्र प्रदर्शन के पीछे इन साइटों का इस्तेमाल किया गया। भावनाओं को छू जाने वाले अनगिनत संदेशों के जरिये दिल्ली के यूथ को टारगेट किया गया। एजेंसी की रिपोर्ट पर कारगर कदम उठाने का निर्णय लिया गया है। सरकार और तमाम खुफिया एजेंसियां उन कारणों पर गहन चिंतन मंथन कर रही है जिससे भविष्य में इस तरह की स्थितियों की पुनरावृत्ति न होने पाए।

आज की तारीख में युवा भारत के पास अपने जज्बात और गुस्से का इजहार करने के लिए वो हथियार है, जिसे कोई नहीं रोक सकता। वो हैं सोशल वेबसाइट्स। जो लोग दिल्ली के इंडिया गेट पर अपना आक्रोश दिखाने नहीं पहुंच सके, वो ट्विटर और फेसबुक सरीखी सोशल वेबसाइट्स पर अपने जज्बातों और गुस्से की इबारत लिख रहे हैं। लेकिन आम आदमी की सोशल मीडिया पर सक्रियता सरकार को रास नहीं आ रही है और येन-केन प्रकरेण वो सोशल मीडिया को दायरे में रखने और रखवाली के उपायों को खोज रही है। सोशल बेवसाइटस पर पोस्ट, कमेंटस और लाइक करना अपराध की श्रेणी में शामिल है और इसकी वजह से कई लोग हवालात की सैर भी कर चुके हैं। गौरतलब है कि शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे की शवयात्रा के दौरान शिवसेना कार्यकर्ताओं द्वारा मुम्बई ठप किये जाने पर शाहीन धाडा नामक युवती ने फेसबुक पर टिप्पणी की थी और उनकी मित्र रेणु श्रीनिवासन ने उसे 'लाइक' किया था। इसके बाद दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया था लेकिन बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया। कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को कार्टून बनाने पर राजद्रोह के मामले में जेल की हवा खानी पड़ी तो वहीं आम आदमी की आवाज दबाने के लिए सरकार और सरकारी मशीनरी आईटी एक्ट की विभिन्न धाराओं का दुरुपयोग जमकर कर रही है। आईटी एक्ट की धारा 66-ए में संशोधन की मांग जोर-शोर से उठने लगी है।

असलियत यह है कि वर्तमान यूपीए सरकार लगभग हर मोर्चे पर फेल दिख रही है। सरकार के हठधर्मी, बेश्र्म और नकारा रवैये के कारण जनता में अंदर तक गुस्सा भरा हुआ है और जनता विशेषकर युवा वर्ग अपनी भड़ास को सोशल वेबसाइटस के माघ्यम से देश-दुनिया में सांझा करता है। इससे जनता के बीच सरकार की छवि को गहरा धक्का पहुंच रहा है। लेकिन समस्या यह है कि सरकार कमियों को दूर करने की बजाय जनता की आवाज दबाने में ऊर्जा खपा रही है। सरकार अपने अपराधों की मुखर आलोचना सुनने की सहनशीलता खो चुकी है और उसी का परिणाम है कि सरकार झुंझलाहट भरे आलोकतांत्रिक व्यवहार पर उतर आई है। सोशल नेटवर्किंग की दुनिया में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर शिकंजा कसने के सरकार के षडयंत्र इसी झुंझलाहट और खीझ की असंतुलित प्रतिक्रिया है जिसे कि वह कई बहानों के चोले से ढंकने का प्रयास कर रही है। योग गुरु रामदेव का आंदोलन रहा हो अथवा अन्ना का अभियान, सरकार व कांग्रेस की तरफ से जिस तरह की प्रतिक्रिया व बयानबाजी की गई वह उसकी हताशा व अवसाद को बखूबी स्पष्ट करती है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की असफलता के साथ साथ राहुल गांधी का औंधे मुंह गिरना और उसके बाद एक और बड़े राज्य आन्ध्र प्रदेश में सूपड़ा साफ होना कांग्रेस और सोनिया गांधी की हताशा के ऊपर और कई मन का बोझ बढ़ा गया। रही सही कसर गुजरात में कांग्रेस की हार ने पूरी कर दी है। निश्चित रूप से इन असफलताओं में कांग्रेस नीत केंद्र सरकार के काले इतिहास का बहुत बड़ा योगदान है।

पिछले दो वर्षों में अन्ना हजारे द्वारा लोकपाल बिल पास करने के लिए चलाया जाने वाला अभियान हो या फिर बाबा रामदेव की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साईट्स की मदद से तेजी से आगे बढ़ी और फ़ैली। अगर ये कहा जाए कि सोशल नेटवर्किंग साइटस ने ही इन आंदोलनों की आग को फैलाया तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। समस्त विश्व में पिछले एक दशक में इन्टरनेट विरोध या असहमति दर्ज कराने के एक नए प्लेटफॉर्म के रूप में उभरा है। इसे दुर्भाग्य कहा जाए या भ्रष्ट मानसिकता का दुराग्रह कि सत्तासीन अपने इन पापों को स्वीकारने व सुधारने के स्थान पर सतत सीनाजोरी का रास्ता अपनाए हुए हैं! इसी दुराग्रह के चलते सरकार अन्ना के विरुद्ध भद्दी बयानबाजी और रामदेव पर सस्ते आरोप लगाकर अपनी साख बचाने का बचकाना प्रयास करती रही है और अब उसी बचकानी सोच का परिणाम है कि सरकार सोशल नेटवर्किंग साइट्स को नियंत्रित करने का प्रयास कर रही है। गूगल सहित फेसबुक व ट्विटर जैसी वेबसाइट्स से सरकार लंबे समय से आमने-सामने की स्थिति में है।

लोकतन्त्र में यदि सरकार सच को स्वीकारने की अपनी अक्षमता के चलते अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के हनन की सीमा तक पहुंच जाए तो यह स्वयंसिद्ध हो जाता है कि सरकार लोकतान्त्रिक व्यवस्था में पूर्णत: असफल हो चुकी है। ऐसी सरकार को लोकतान्त्रिक व्यवस्था में बने रहने का नैतिक अधिकार ही नहीं रह जाता है। 1975 के आपातकाल के बाद आज पुन: एक बार सरकार यदि उस स्थिति में नहीं तो उस मनोदशा में अवश्य पहुंच गई है। फिनलैंड ने विश्व के सभी देशों के समक्ष एक उदहारण पेश करते हुए इन्टरनेट को मूलभूत कानूनी अधिकार में शामिल कर लिया। वहीं विश्व के सबसे बड़े और सफल लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले हमारे राष्ट्र में नकारा और निकम्मी सरकारें अपनी नाकामियां, असफलताओं, लचर कार्यप्रणाली, लालफीताशाही, भ्रष्‍ट्राचार और कमियों को ढंकने के लिए आम आदमी की आवाज को दबाने का जो कुचक्र रच रही हैं वो किसी भी दृष्टिï से स्वस्थ प्रजातंत्र का लक्षण नहीं है वहीं यह संविधानप्रदत्त मौलिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन भी है। अगर सरकार आम आदमी की आवाज दबाने की बजाय उसे सुनने और समझने का प्रयास करे तो देश की दशा और दिशा बदल सकती है। अदम गोंडवी का शेर इस हालात के माकूल है-

ताला लगा के आप हमारी ज़बान को,
कैदी न रख सकेंगे ज़ेहन की उड़ान को।

लेखक डा. आशीष वशिष्‍ठ स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

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