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बिजनेस

अलविदा रिलायंस सीडीएमए

  • Written by अमित कुमार सिंह
  • Category: बिजनेस

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रिलायंस की सीडीएमए सेवा अपनी अंतिम सांसे गिन रही है। रिलायंस ने अपने सभी सीडीएमए कस्टमर्स को जीएसएम के 4G नेटवर्क में अपग्रेड करना शुरु कर दिया है। 93 नंबर से शुरु होने वाली रिलायंस की सीडीएमए सेवा की अब तक अपनी अलग पहचान रही है। जीएसएम में अपग्रेड होने के बाद अब इस नंबर का अस्तित्व तो रहेगा, लेकिन सीडीएमए वाली पहचान नहीं रह पाएगी। वर्षों से रिलायंस सीडीएमए फोन का इस्तेमाल करने वाले मेरे जैसे लोगों का इससे कितना लगाव रहा है, इसकी बयां शब्दों में करना मुश्किल प्रतीत हो रहा। रिलायंस से मेरा गहरा लगाव रहा है। आज से 14 साल पहले हुई लॉन्चिंग के शुरुआती दिनों में ही रिलायंस सीडीएमए से मेरा संबंध जुड़ गया था। तब पटना में हुआ करता था, और अब दिल्ली में। लेकिन रिलायंस सीडीएमए फोन हमेशा मेरे साथ रहा। हां, इस दौरान कई बार मेरे फोन नंबर बदल गए, लेकिन क्या मजाल कि सीडीएमए छोड़कर जीएसएम सर्विस की तरफ कभी आंख उठाई हो।

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प्राइवेट क्षेत्र में न्यूनतम वेतन कब

  • Written by अभिषेक कांत पाण्डेय
  • Category: बिजनेस

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हर किसी के जीवन में कुछ न कुछ ऐसा अनुभव होता है जो सोचने पर मजबूर करता
है। ऐसे अनुभवों में मैं पिछले महीने से जूझ रहा हूं। ये मेरा व्यक्तिगत
अनुभव है लेकिन सही मायने में ये दर्द हर उस व्यक्ति का है जो जीना चाहता
है, सम्मान की जिंदगी चाहता है। भारत में रहने वाले उन करोड़ों लोगों की
कहानी है। इसमें मजदूर से लेकर महीने पगार पाने वाले कामगार, ठेके पर
मजदूरी करने वाले या किसी कंपनी में कंप्यूटर वर्क करने वाले यहां तक की
पत्रकार, शिक्षक, हर वो कोई जो अपने हाथों से मेहनत करता है, उसके बदले
उस बेहतर जिंदगी के लिए उचित वेतन पाने का अधिकार है। लेकिन इन प्राइवेट
क्षेत्रों में सही सरकारी नीति का न होना व कामगारों के लिए ठोस कानून का
नहीं होना, यहां पर करोड़ों लोग अपनी जिंदगी होम कर रहे हैं। कम वेतन  व
काम के अधिक घंटे उनके प्रकृतिक जीवन के साथ खिलवाड़ है। बेगारी व शोषण
के शिकार  ऐसे लोग उन नियोक्ता के लिए काम करते हैं, जो वाता​नुकूलित
ढांचों में सांसें लेते हैं और काम कराने के लिए ऐसे वर्गों का उदय किया
है जो बिल्कुल अंग्रेजों के जमीदारों के भूमिका में है, ऐसे चुनिंदा
मैनेजर जो अपनी अच्छी सैलरी के लिए अपने निचले स्तर के कर्मचारियों का
शारीरिक व मान​सिक शोषण करते हैं। बारह से सोलह घंटे का करने वाले ये
मानव भले ही लोकतंत्र के छत्रछाया में जी रहे हों लेकिन सही मायने में
लोकतंत्र तो इनके नियोक्ता के ​लिए ही है।

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आरजी पर भारी पीके : पुराने कांग्रेसी घुटन में... बड़ी साज़िश का अंदेशा...!

  • Written by आजाद खालिद
  • Category: बिजनेस

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नई दिल्ली : क्या देश की सबसे पुरानी सियासी पार्टी इन दिनों किसी बड़ी साज़िश का शिकार हो रही है? क्या कांग्रेस के अंदर ही राहुल गांधी पर प्रशांत किशोर हावी होते जा रहे हैं?  क्या जिस प्रशांत किशोर को कांग्रेस ने अपनी नय्या पार लगाने के लिए मोटी रकम अदा की है, वो बीजेपी द्वारा कांग्रेस में फिट गये मोहरे तो नहीं ? क्या बीजेपी के कांग्रेस मुक्त भारत के प्लान पर  पीके आज भी  काम तो नहीं कर रहे ? क्या कई साल से हाशिये पर पड़ी कांग्रेस का सच्चा समर्थक और कार्यकर्ता वर्तमान में उपेक्षा और घुटन महसूस कर रहा है? क्या कांग्रेस को दोबारा खड़ा करने के नाम पर कोई बड़ी साज़िश तो नहीं रची जा रही है?

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मोदी सरकार का सबसे बड़ा संकट है अपेक्षित विनम्रता का अभाव

  • Written by संजय द्विवेदी
  • Category: बिजनेस

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बौद्धिक वर्ग से रिश्ते सुधारे मोदी सरकार, अच्छी नीयत से किए गए कामों को भी चाहिए लोकस्वीकृति

अपने कार्यकाल के दो साल पूरे करने के बाद नरेंद्र मोदी आज भी देश के सबसे लोकप्रिय राजनीतिक ब्रांड बने हुए हैं। उनसे नफरत करने वाली टोली को छोड़ दें तो देश के आम लोगों की उम्मीदें अभी टूटी नहीं हैं और वे आज भी मोदी को परिणाम देने वाला नायक मानते हैं। देश की जनता से साठ माह में राजनीतिक संस्कृति में परिर्वतन और बदलाव के नारे के साथ इस सरकार ने 24 माह में अपनी नीयत के जो पदचिन्ह छोड़े हैं, उससे साफ है कि सरकार ने उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार को रोकने और कोयले, स्पेक्ट्रम जैसे संसाधनों की पारदर्शी नीलामी से एक भरोसा कायम किया है। देश की समस्याओं को पहचानने और अपनी दृष्टि को लोगों के सामने रखने का काम भी बखूबी इस सरकार ने किया है। राज्यसभा के विपरीत अंकगणित के चलते कुछ जरूरी कानून जैसे जीएसटी अटके जरूर हैं, किंतु सरकार की नीयत पर अभी सवाल नहीं उठ रहे हैं।

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ये चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए बड़ा झटका, भाजपा के लिए खतरे की घंटी

  • Written by विवेक दत्त मथुरिया
  • Category: बिजनेस

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पश्चिमी बंगाल, केरल, तमिलनाडु, असम और पुंडुचेरी के चुनाव परिणामों के जिस तरह के नतीते आए हैं, वह ममता बनर्जी और जयललिता के लिए तो बड़ी उपलब्धि है। बाकी कांग्रेस, वामपंथी और भाजपा के लिए चिंता और चिंतन का विषय है। असम में भाजपा की जीत को असमिया जनता के जायका बदलने इच्छा और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की सियासत के रूप में देखना-समझना होगा। पांचो राज्यों के चुनाव परिणाम का एक सार यह भी है कि मोदी सरकार के अच्छे दिनों के दावे को जनता ने खारिज कर दिया है और इस तरह भाजपा के लिए खतरे की घंटी बजा दी है।

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